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शीशे के मकान
शीशे के मकान
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© Himani Sabharwal

Drama

1 Minutes   1.3K    11


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घर केवल वो,

मकान न था,

वो गूँज थी,

वो आराम भी था ।


आप न थे,

था मैं भी नहीं,

हमारा सारा,

जहां-सा था ।


फ़िर ये शीशे,

सब क्यों तोड़ दिये,

चुभने जो आपके,

पैरों में लगे,

अखरते भी होंगे,

आँखों को ।


हमसे तो,

न ही पूछें जनाब,

हमारे तो,

दिल ही में दिये,

इन टुकड़ों ने,

घाव बना ।

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