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तसले में ताजमहल
तसले में ताजमहल
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© कवि उपाध्याय

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एक दिन देखा मैंने ताजमहल वो भी तसले में

हां हां तसले में, वही टिन का बना हुआ

गोलाई में मुड़ा हुआ

तसला उठाये कोई मुमताज काम पर जा रही थी

70 सालों से शाहजहां का साथ वो चाह रही थी

शाहजहां को भी जाने कैसा गुरुर हो गया

पूरा ताजमहल अपनी संपत्ति समझ

चाटुकारों में बांट मशहूर हो गया

बच्चे भूखे हैं कई दिन से संगमरमर पर लेटे हैं

हाथ कटा कारीगर भी फुटपाथों पर बैठे हैं

ताजमहल के बीचों बीच ये रंगोली किसने बनाई है

खून से सनी दीवारों पर मेहंदी किसने लगाई है

मुमताज के हाथों में अब मजदूरी के छाले हैं

ताजमहल की खिड़कियों पर जातिवाद के जाले हैं

कितना भार सहा होगा उस भूखी मुमताज ने

तसले में बैठे इतराते बलखाते इस ताज ने

ताजमहल जब तसले में आकर सिमट गया

कवि भी कल्पना में भूखी माँ से लिपट गया

मुमताज शाहजहां दीवार

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