Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
मैं राधा
मैं राधा
★★★★★

© Udbhrant Sharma

Others

3 Minutes   13.3K    2


Content Ranking

‘‘होली के अवसर पर ‘लेखनी’ की विशिष्ट प्रस्तुति’’

मैं राधा

-ंउचयउद्भ्रांत

स्मृति के

काले बादलों के बीच

मोरपाँख हँसती है

चुपके से

बिजली-ंउचयसी चमक गई तम में

रागिनियाँ कौंधीं सरगम में

अचरज है

भरी आँख हँसती है

चुपके से

प्राण-ंउचयभवन में वसन्त डोला

साँसों का पंछी यह बोला

‘खिड़की से कौन

केसर की छूटी पिचकारी

रँगी दि-रु39याा की सुन्दर साड़ी

पल्लू में

नखत टाँक

हँसती है चुपके से!

स्मृति की ऋतुओं में

मस्ती के

मादकता के बहुविध रंगों को

मन की अलबेली

उत्फुल्ला पिचकारी से

1 द्य च्ंहम

सभी द-रु39याों दि-रु39यााओं में बिखराती

फाल्गुन मास के -रु39याुक्ल पक्ष की

नवमी के दो प्रहरों वाली

बरसाने की

असीमित आनन्द की अनुभूति देती

वह होली की ऋतु भी;

चंदन से भी अधिक सुगन्धित

ब्रज की माटी ही

बनी हो गुलाल जहाँ;

और जमुना के जल में भीगे हुए

टेसू के फूलों से

बरसता था

खिली धूप जैसा

पीताम्बरी रंग-ंउचय

मु-हजयको

ब्रज की गोपियों को

और तुम्हें

एक ही रँग में रँगने!

और जिसमें

तुम्हारे अधराधरों के

चुम्बन के लिए

सदा तत्पर रहने वाली

दु-ुनवजयट वं-रु39याी को तुमसे छीन

तुम्हारी सुकोमल पीठिका पर

उसी से प्रहार किये थे मैंने

और तुम-ंउचय

अपनी इस राधा-ंउचयवं-रु39याी की

सम्प्रीति-ंउचयधारा के

अनोखे आराधन वाले-ंउचय

2 द्य च्ंहम

हर नये स्वर-ंउचयप्रहार के सँग

अधिकाधिक

प्रमुदित-ंउचयआनन्दित होते हुए

और खिलखिलाते हुए

प्राणों के द्यु-ंउचयलोक में प्रवाहित और

दिव्यतम विचार-ंउचयक्षीरसागर से निःसृत

अपनी गुरु-ंउचयगम्भीर वाक्गंगा को

करते हुए स्थगित

जमुना की कल-ंउचयकल लहरों वाले

-िहजयलमिल रसव-ुनवजर्याी बिम्बों से

धाराधार मु-हजये

भिगोते हुए

यहाँ से

वहाँ

वहाँ

और

से

वहाँ

भागते-ंउचयछिपते

आँख-ंउचयमिचैनी कभी

लुका-ंउचयछिपी जैसा कुछ खेलते

कैसा वह

भावातीत

दृ-रु39यय था विरल

देखकर जिसे-ंउचय

बरसाने की समस्त गोपियाँ

अपने-ंउचयअपने घरों में

-सजयोर-ंउचयडंगर हाँकने के लिए रक्खे

3 द्य च्ंहम

बड़े-ंउचयबड़े लट्ठ ले

पहुँच गईं

गाँव की चैपाल बीच

और वहाँ उपस्थित

ग्वालों-ंउचयगोपालों की पीठों पर

बरसाने लग गईं

उन्हें

बाँसुरी की तरह!

ग्वालों की पीठों पर

पड़ती लाठियों की गूँज

-रु39यानैः-ंउचय-रु39यानैः परिवर्तित हो जाती

वं-रु39याी से निःसृत

मनमोहक रागों में

लट्ठमार होली वह कहने को

वह तो थी

मेरे ही द्वारा आवि-ुनवजयकृत

माधव की वं-रु39याी से

उसी की पिटाई करने वाली

लाल, गुलाबी, नीले, पीले

रंगों के

विविध स्वरों की

बौछारों से

वस्त्रों-ंउचय

अधोवस्त्रों को

भिगोती हुई उन्हें

तुम्हारे

सुगठित

देह-ंउचयछन्द से करती

एकाकार-ंउचय-हजयंकृत

4 द्य च्ंहम

और यों-ंउचय

‘रमा’ को भावना के

आवेग से पलटकर

‘मार’ को लज्जा से भरती-ंउचय

प्रताड़ित करती हुई-ंउचय

‘वं-रु39याीमार’ होली!

जोकि ध्वनित

और प्रतिध्वनित होती

गोप-ंउचयगोपिकाओं की

लट्ठमार होली में;

उनके अधरों से उल्लसित होते

ब्रज के रस से आप्लावित होली गीत

‘लला, फिर आदयो खेलन होली’

और

‘आज बिरज में होली आई रे रसिया’

की तान छेड़ते रसिया गीतों में;

यहाँ तक की-ंउचय

-सजयोलक की थापों और

मँजिरों की -हजयन-ंउचय-हजयन की लय पर

ब्रज की बइयरों’ द्वारा

प्रथक-ंउचयप्रथक अवसर पर

गाई जाने वाली

मिसरी-ंउचयसी मीठी

मक्खन-ंउचयसी कोमल

और जामुनों-ंउचयजैसी खटमिट्टी-ंउचय

ब्रज थेठ

परम मौलिक गारियों में!

क्रोधिती है स्मृति में

उसे अति समध

5 द्य च्ंहम

और नव्यतम बनाते हुए

रंगों की फुहारें छोड़ती हुई

अविस्मरणीय होली वह-ंउचय

नन्दग्राम की पृथ्वी से लेकर

बरसानी के असिम नभ तक को

काम धेमुओं वाले गोकुल के वासियों को

पंक में नहीं-ंउचय

उज्जवल, -रु39याीतो-ुनवजयण

दुग्ध-ंउचयधरों में सराबोर करती

और माँ वृन्दा (के) वन को

अपने वासन्ती संस्प-रु39र्या की बयारसे

करती हुई विभोर;

मस्ती भरे भागों से

प्राण के गुह्यतमतल से उठकर

चेतना के

ओर-ंउचयछोर तक फैलने वाले

अनहद रागों से

करती जो गुंजायमान;

और जो-ंउचय

मृत्यु के

अँधेरे रास्ते पर

अग्रसर होते वृद्धजनों

और रुग्णजनों के

निस्तेज नेत्रों को भी

असामान्य दिव्य सुख देने वाली

एक चमक से भरती

उनके अस्ताचलगामी

मुखमण्डल को भी वह

कर देती प्रका-िरु39यात

6 द्य च्ंहम

स्मृति के

उत्सव-ंउचयपर्वों में

मलिनता के होलिका-ंउचयदहन के बाद

प्रातःकाल

सूर्योदय के बाद से प्रारम्भ हो

च-सजय़ते हुए सूर्य के

दो प्रहरों तक

चरमोत्क-ुनवजर्या तक पहुँचा पर्व वह

विलक्षण था।

स्यात्,

इसलिए-ंउचय

जिसमें

मैं राधा-ंउचय

अयि माधव!

मन की सम्पूर्ण गहराइयों से

प्राण के समस्त आयामों के साथ

तुम्हारी-ंउचय

हाँ, मात्र तुम्हारी ही

हो

ली!

(कवि के बहुचर्चित महाकाव्य ‘राधामाधव के अंतिम सर्ग

‘अनादि-ंउचयअनंत’ का एक अं-रु39या)

राधा poetry holy traditional

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..