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नयनों में बादल छाऐ
नयनों में बादल छाऐ
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© Udbhrant Sharma

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फिर उमड़-घुमड़ कर नयनों में बादल छाऐ

फिर बरस उठा लो चुपके-चुपके गंगाजल

मन में चपला-सा याद तुम्हारी लहराती
वह बीती हुई कथा कब की फिर दुहराती
उजड़े सूने क्षण की ओटों से झाँक-झाँक
सहसा घूँघट-पट हटा, देखती, छिप जाती
स्वर दूर गगन में आज तुम्हारा सुनते ही
लो छलक उठा गीतों से भरा हुआ आँचल

प्राणों की धड़कन में लो बोल रहा पपीहा
अनुगूँज उठी है सभी तरफ़ अब-‘पिया! पिया!’
उस झिलमिल करते एक नखत को देख-देख
अब जाने क्यों आशंकित-सा हो रहा हिया
जो मादक सपनों का संसार सृजित करतीं
वे हुईं भावनाऐं मेरी सारी घायल

बदली बरसी है ख़ूब मगर प्यासे हम तो
क्या बतलाऐं क्यों हुऐ अब रुआँसे हम तो
जल-सिंधु अगम, पर तृष्णा का भी अगम सिंधु
अब घूम रहे हैं सभी तरफ़ उदासे हम तो
अब किरन एक भी छूने से हमको डरती
हो गये अचानक बंद-खिले-मन के पाटल

रह-रह कर आलोड़ित हो उठता है अंतर
पड़ गयी अचानक चिंतन की गति भी मंथर
इतना पीड़ा ने अंतरतम को बेध दिया
लगता है एक-एक पल जैसे मन्वंतर
मैं साथ तुम्हारा दूँगा सदियों-सदियों तक
पर बाँधो तो रूपसि! अपने पग की पायल

नयनों में बादल छाऐ

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