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पता ख़ुशी का
पता ख़ुशी का
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© Lalit Mandora

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एक से मैंने पूछा
कि जानते हो क्या आप
कि
ख़ुशी कहाँ रहती है
कहने लगा वह बड़े अदब से
भाई जी!
मैं आज तक अपने को ठीक से
समझ नहीं पाया कि मैं कहाँ रहता हूँ
एक लड़की से पूछ लिया
क्या जानती हो बेटी
कि
ख़ुशी कहाँ रहती है
पहले ही उसने टोकते हुए कहा
ओ अंकल,पहले तो बेटी शब्द नहीं बोलने का
मेरा बाप मेरी माँ का सगा नहीं हुआ साला
तो मुझे क्या पता
कि किस फ्लैट में रहती है
मुझे तो इतना पता है
कि मैं धंधा करती हूँ और मेम साब टाइप से
जो काल सेंटर में या मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है
उन जैसा ही पैकेज मेरा है
अब बोलो!
चलते हो खंडाला या लोनावला
मेरी बोलती बन्द थी
क्या हुआ जमाने को
उसकी सोच को
जब पकड़ा जाता है कोई निरपराध किसी फर्जी बलात्कार में
जब जांच होती है तो रपट बताती है
क़ि यह अपनी पुरूषत्व शक्ति खो चुका है
गलती से पकड़ा गया
बहरहाल ख़ुशी लापता है
सुना है ख़ुशी किसी जहाज में आई
जहाज में गई
बेपरवाह मौसम में खूब चिल्लाई
लेकिन फिर भी वह लापता है
किसी मध्यवर्गीय के घर से
किसी बीवी की सोच से
किसी घर के साजो-सामान से
ख़ुशी के बारे में पूछ लिया किसी व्यापारी से
उसका जवाब था
ख़ुशी मॉल में
ख़ुशी पव्वे में
ख़ुशी बोतल में
ख़ुशी अनैतिक सम्बन्धों में
बहुत पास से गर्क होते ज़माने को देख रहा हूँ
कहाँ थे और
कहाँ आ गए
ज़रा सोचिये
बाई दवे यदि ख़ुशी आपको मिल जाये
तो उसे मेरा पता भी दे देना
मैं भी जान लेना और समझ लेना चाहता हूँ
कि अब वह कैसी दिखती है।

#पता ख़ुशी का #poem

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