Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
नदी की आत्मकथा
नदी की आत्मकथा
★★★★★

© Anand Kumar Jha

Drama

1 Minutes   13.7K    5


Content Ranking

हिमगिरि से निकल कर कल-कल,

निरंतर प्रवाहमान करती छल- छल,

है मेरी जलधारा निर्मल,

पर्वत श्रृंखला माता पिता मेरे चंचल !


लाड-प्यार से मुझको पाला,

मुझमे स्वछंद प्रवृति भर डाला !

पिता बोले जाना होगा,

प्यास मुझे बुझाना होगा !


अनेक कष्टों को सहके,

बाधाओं का सामना करके,

चलती गयी अपने पथ पे !


धन-धान्य उगाकर पेट पालती,

सर्वत्र हरियाली ही फैलाती !


मनुष्य ने ना समझा मेरा महत्व,

छीन लिया मेरा अस्तित्व,

दाव पे है मेरा व्यक्तित्व !


मुझे दूषित करना समझो पाप,

नहीं तो एक दिन दूंगी भयंकर श्राप !

बढ़ाते रहो खूब आबादी,

एक दिन लाएगी ये बर्बादी,

छिन जाएगी सारी खुशहाली,

और ना रहेगी धरती पे हरियाली I

River Pollution Nature

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..