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परिन्दे
परिन्दे
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© Atul Balaghati

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चीर तिमिर को प्राची ने
एक फूल खिलाया है।
जाग परिन्दे जाग
अब दिनकर आया है।

 

तू किस स्वप्न में मगन है
भँवरों से गूँजा चमन है
उठ! धूप तेज़ होने लगी
दुनिया घर से चलने लगी
तू हताश बैठा नीड़ में,
ऐसा क्या गँवाया है
जाग परिन्दे जाग
अब दिनकर आया है!!

 

रख हौसला भर उड़ान
हो जाऐगा तेरा सारा जहान
अपनी रगोंं में नई उमंग, नया जोश भर
बढ़ा कदम युध्द का उद्घोष कर
आँख मिला तूफ़ानों से
तेरे भाग्य समर आया है
जाग परिन्दे जाग
अब दिनकर आया है

 

भर हुँकार,
सूरज का तेज़ नम होगा
मार पंख थपेड़ों पर,
समंदर भी सम होगा
बढ़ता जा आगे उस ओर
जहाँ, टिका है क्षितिज का एक छोर
जा, वहीं मिलेगी मंज़िल
जो आँखों में बनाया है
जाग परिन्दे जाग
अब दिनकर आया है!!

परिन्दे

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