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सहमा - सहमा
सहमा - सहमा
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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वही हवाऐं बारूदों की ,अबके किसकी बारी है 
दिल सहमा - सहमा लगता है , दंगों की तैयारी है

किस के घर आँगन में अब के ,कोई मातम छाएगा 
किसका बेटा दिन का निकला, लौट के घर ना आएगा 
किसका अब सिंदूर उजड़ेगा , चूड़ी तोड़ी जाएगी 
किस बस्ती में क़फन दफ़न की चीज़ें जोड़ी जाएँगी
किसकी बहना आँसू से ,मायूस का मुखड़ा धोएगी
किसकी बेटी शव से लिपटी ,पापा - पापा रोऐगी

किसकी साज़िश है , ये मंज़र किसकी दावेदारी है , 
दिल सहमा - सहमा लगता है, दंगों की तैयारी है ................ ॥१॥

खंडन की पीड़ा से जलती ,घाटी तुम्हे निहार रही । 
भारत माँ की हृदयवेदना ,बेटों को धिक्कार रही । 
फिर से अब गूँजेंगे नारे ,मस्ज़िद और शिवालों में । 
मानवता का ख़ून लगेगा ,लाठी ,बर्छे ,भालों में । 
फिर निकलेंगे आधे क़ातिल, हाथों में त्रिशूल लिये । 
आधे हथियारों संग अपने ,बेतरतीब उसूल लिये ।

नये दौर में मौत ब्याज सी,जीवन एक उधारी है 
दिल सहमा - सहमा, लगता है दंगों की तैयारी है.................... ॥२॥ 
 

आओ गीता और कुरान के हर्फों को पढ़कर देखो ।
अधिकारों का ध्यान तजो , कर्तव्यों पे अड़ कर देखो । 
तब शायद समझोगे तुम ये ,मानवता का धर्म है क्या ।
अपनों के खोने से जन्मा, हृदयविदारक मर्म है क्या । 
पशुओं सा व्यवहार रखा तो ,किस जन्नत में जाओगे ? 
अर्थहीन , मिथ्या सा जीवन, जी कर तुम मर जाओगे ।

 

सहमा - सहमा

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