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बस इतना समझ लेना...
बस इतना समझ लेना...
★★★★★

© Anuradha Kadam

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नदी की तरह बहती लगूँगी तुम्हे...
दो किनारे जोड़ रही हूं...
बस इतना समझ लेना

लगे कभी के मुँह फेर के खड़ी हूं
रोक रही हूं तूफाँ तेरी तरफ आनेवाला
बस इतना समझ लेना

लगे कभी सूखा है इन आँखों में आजकल
भरी आँखों से चेहरा दिखता नहीं तुम्हारा...
बस इतना समझ लेना

हँसी रहेगी लबों पर हँसती अच्छी लगती हूं न तुम्हे
लब कोई और नाम न लेंगे...
बस इतना समझ लेना

खामोश लगूंगी कभी किसी अनजान की तरह
रिश्ता सवाँर रही हूं दिल में...
बस इतना समझ लेना

लफ्ज़ कहेंगे शायद रास न आनेवाली बाते
वो एहसास नहीं बस अल्फ़ाज़ होंगे...
बस इतना समझ लेना

बदली सी लगूं गर कभी...
तुम हैरान न होना... दिखता है आँखों को हमेशा जो...सच नहीं होता...
बस इतना समझ लेना



कविता प्यार

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