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रजनीगंधा हूँ मैं
रजनीगंधा हूँ मैं
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© K D Charan

Abstract Others Inspirational

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रजनीगन्धा हूँ मैं,

रंगोआब खुशबू से शेष

ज, हाँ रजनीगंधा ही हूँ मैं,

वह रंगोआब, खुशबू वाला पुष्प नहीं,

जो जीवन में भाव भरता है,

नयापन लाता है।

समय रंगकर होठों की लाली बढाने वाली,

पीक के लाल छर्रों वाली,

मुलायम-कठोर कणों के गुण धर्म वाली

रजनीगन्धा ही हूँ मैं।

एक पतली परतदार चिकनी, चमकीली,

लज़ीज़ पोटली,

जिसे रसिक फाड़कर,

कुछ देर बाद,

स्वादहीन करके पीक के छर्रों से,

उगल देता है पीकदान में,

या इधर-उधर,

उछालता है हर कण,

स्वादसुधा से विभोर होकर,

कुछ तो निगल ही जाते है कमबख्त

जी, हाँ रजनीगंधा ही हूँ मैं।

अनवरत मेरी शार्गिदी,

अच्छी बात नहीं,

फिर मैं अपनी रक्तिमता जमाकर,

अशेष कर देती हूँ अपने ही रसिक को,

हाँ, रजनीगंधा हूँ मैं।

पीक के लाल छर्रों वाली।

जिससे वक्त का ज़र्रा रंगकर,

एक स्वादातुर रसिक कणों के साथ खेलता हूं,

समय को ढेलता है,

कुछ देर बाद मुझे ही धकेलता है,

आखिरकार मैं ही उसके राग का कारण बनती हूं।

रजनीगंधा हूँ मैं,

जिसे कुछ लोग स्त्री कह देते है।

पीक के लाल छर्रों वाली

पतली, परतदार, चिकनी, चमकीली

लज़ीज़ पोटली।

रंगोआब, खुशबू से शेष,

जी हाँ, रजनीगंधा ही हूं मैं।

कविता रजनीगंधा के डी चारण स्त्री का बयान

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