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-: जरा बात अलग है: -
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© Prakash Yadav Nirbhik

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इस शहर के लोगों की जरा बात अलग है

मिलते हैं सब ईद गले पर जात अलग है

 

ईदगाह में इबादत और मंदिर में है पुजा

दुनिया में भारत का ये सौगात अलग है

 

कुछ मतलब परस्तों ने सिर झुका दिया

वरना हिंदुस्तानियों के जज़्बात अलग है

 

न आओ कभी उनके चंगुल में मेरे यारो

इनके तो बस अपने करामात अलग है

 

न मजहब न इंसानियत के है रखवाले

संभल कर तू रह जरा हालात अलग है

 

मिलते है शादियों में दिल खोल के दोनों

दिखाने को हमें कहते मुलाक़ात अलग है

 

कब तक करोगे तुम ऐसी गंदी सियासत

जनता की भी अपनी तो औकात अलग है

 

कई दिग्गजों के सत्ता गए हैं कभी छिने

सुधरो तेरे सोच के ये निशानात अलग है

 

धर्म नहीं सिखाती है आपस में वैर रखना

पंडित और मौलवी के तो घात अलग है

 

मत करो कोई भी अपनी निजी वकालत

ये घर का मसला है न मामलात अलग है

 

नापाक इरादों से जो देखते है गुलशन

चुभते हैं आँखों में काटें खयालात अलग है  

 

हिन्द के उपवन गुल खिलेंगे “निर्भीक”

जो न समझ पाये उनकी बात अलग है

 

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