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प्रीत की डोर.....
प्रीत की डोर.....
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© Anupama Gupta

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प्रीत की डोर.....

कुछ ही पलों की मुलाकात में,
एक रोज यू ही 
जुड़ गई थी प्रीत तुमसे..
दिन ब दिन गहरी होती रही ए प्रीति
बढ़ती रही

अचानक एक दिन 
न जाने क्यों
तुमने उखाड़ दिया 
जड़ से
इस गहरी जमी प्रीत को
आह भी न कर पाई 
बस अंदर ही अंदर
इस उखड़ने की पीड़ा 
सालती रही मन को..

कुछ न था कहने सुनने को
बस बची थी कुछ 
बीते लम्हों की यादें
कुछ तुम्हारी पुरानी बातें

याद आया 
अक्सर कहा करते थे तुम
ए हमारे प्रीत की मजबूत डोर है
जिसका टूटना कठिन है।
आज मैं समझी
कि तुम्हारे लिए 
ए बस एक डोर थी,
प्रीत की डोर 
जिसे बड़ी आसानी से
एक झटका देकर तोड़ दिया तुमने..!

पर मैं क्या करूँ ?
मेरे लिए यह कोई डोर न थी
केवल प्रीत थी
केवल प्रीत.. 
ह्रदय में धड़कनों से जकड़ी
जिसे कुरेदना भी संभव न था
मेरे लिए ..
इसीलिए 
आज ये अंतस की पीड़ा है।

सोचती हूँ
मैं भी तुम्हारी तरह
मुक्त हो जाती 
इसे तोड़कर॥..
काश ! मान लिया 
होता मैंने इसे 
प्रीत की डोर 
केवल डोर ..
ए प्रीत की डोर !

preet

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