इकरार, इजहार और इनकार

इकरार, इजहार और इनकार

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कुछ दिलचस्प बात है बयां कर रहा हूँ,

तुम्हारे पढ़ने के लिए ही लिख रहा हूँ।


वैसे तो ये सभी के साथ होता है,

कभी इकरार, कभी इजहार तो,

कभी प्यार में इनकार भी होता है।


भरोसा नहीं था प्यार पर मुझे,

फिर भी कुछ कुछ होने लगा था।


दिल देखते ही धड़क उठता और,

जाने क्या मन ही मन सोचने लगा था।


प्यार जो होने लगा था मुझे पर,

बड़ी मुश्किलों से मैंने इकरार किया।


अब डर लगता था उसे बताने में,

पर इजहार करना भी जरूरी है।


कदम सोचते ही पीछे हट जाते थे,

इसी डर से कि वो नहीं बना ले दूरी है।


एक रोज सरे आम मैंने उससे,

अपनी मोहब्बत का इजहार किया।


पल भर में टूटे सारे सपने मेरे,

जिस रोज उसने मुझे इनकार किया।


पहले तो अपने दिल को समझाओ,

फिर खुद को इकरार होता है।


बात अक्सर दिल में ही दब जाती है,

बड़ी मुश्किल से इजहार होता है।


जिसकी सोच में दिन रात डूबे हुए हैं,

उन्हीं की तरफ से इनकार होता है।


मिशाल देती है दुनिया जिसकी,

क्या सच में ये वही प्यार होता है।।


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