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अबके सावन
अबके सावन
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© Rashi Singh

Drama Fantasy

1 Minutes   6.9K    9


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सावन की रिमझिम फुहार,

तन पर जब से पड़ी हैं,

तोहे का बतायें सखी,

मन की बगिया खिली हैं ।


रोम-रोम होय पुलकित,

गाये मीठी मल्हारें कई,

जैसे पहली बार सजन से,

मिले सजनी कोई ।


हाथन चुरियाँ माथे पे,

बिन्दिया सजने को मेरे,

दिल की धड़कन,

धक-धक करने लगीं हैं ।


आये सजनवा मुद्दत बाद,

विदेशवा से घर मा,

इक ओर सजनी दूजे,

साजन बीच नदिया बही हैं ।


तरस गयीं अँखियाँ,

पिया से मिलन को ऐसे,

जैसे अब ये कारे-कारे,

बदरा नील गगन से बरसें ।

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