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काव्याग्नि
काव्याग्नि
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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रूग्णदीप पोषित कर उसको आफ़ताब लिख देता हूँ , 
मैं पीड़ा के भाव बदलकर इंक़लाब लिख देता हूँ , 
पत्रकार या चित्रकार हो मुझको पड़ता फर्क़ नहीं , 
ओज छोड़ शृंगार लिखूँ मैं ये भी कोई तर्क नहीं | 


लोकतंत्र है जन-गण-मन का दर्पण बनके डोलूँगा , 
रक्तिम, श्यामल जैसे भी हो सारे परदे खोलूँगा , 
तांडवजन्मा प्रलयअंश हूँ केवल रचनाकार नहीं , 
देशद्रोह के निजपुत्रों का कर सकता सत्कार नहीं , 


नित स्वप्नों में संविधान को मुर्दाघर में देखा है , 
लोकतंत्र नफ़रत दहशत के बीच भँवर में देखा है ,
जलते ध्वज की दुर्गंध कभी महसूस करो तब जानोगे, 
लुट चुकी बेटियों-बहनों के दु:ख को समझो तब मानोगे | 


जब नंगा बचपन सड़कों पर रो चीख-2 मर जाता है, 
तब शर्मसार यौवन होता मन पीड़ा से भर जाता है , 
बहुत कठिन है ये आवेदन कैसे मैं स्वीकार करूँ, 
कैसे मैं माँ का दर्द भुला दूँ कैसे मैं शृंगार करूँ , 


कैसे पल-पल जलते आँचल को अनदेखा कर दूँ , 
कैसे मैं हुंकार तजूँ मैं कैसे सरससौम्य स्वर दूँ | 
चिपके पेटों को देखूँ तो भूख-भूख चिल्लाने दो , 
द्रोहशिखा रहने दो मुझको विद्रोही कहलाने दो |

kavita fire ras oj sringar kavi vidrohi vijay

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