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तुम ही हो
तुम ही हो
★★★★★

© Prasun Upadhyay

Romance

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वक्त बेवक्त सोचता हूं,खोजता हूं तुझे सारा जहां
छूकर जाती हवा से तेरी मौजूदगी पूछता हूं
जहां-जहां पड़े तेरे कदम उनके निशां पे अपने कदम डालता हूं
हंसी की खिलखिलाहट जहां गूंजी वहां तेरा पता ढूंढता हूं
छूता हूं तेरी परछाई और तूझे महसूस करता हूं
तेरे लिखे ख़त में चेहरा तेरा देखता हूं
ज़ुल्फ़ों की आड़ में तुझे ताकता हूं
सुनकर तेरी आवाज़ तुझे पुकारता हूं
कानों में तेरे अपने जज़्बात घोलता हूं
जहां होता हूं बस तुझे पाता हूं
तेरे एहसासों के आंगन में सोता हूं
तेरे ख्वाबों के जुगनू संग रात गुजारता हूं
तकिये की खुशबू में मेरे अरमान संजोता हूं
हर सिलवट में चादर की तुझे खोजता हूं
तू चाहत मेरी तू मुहब्बत मेरा, सब तुम ही हो
फिर भी खुद में तुझे तलाशता हूं।

तुम ही हो जहां होता हूं बस तुझे पाता हूं तेरे एहसासों के आंगन में सोता हूं !

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