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अनुकृति
अनुकृति
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© Jata Shankar Tripathi

Inspirational

1 Minutes   13.7K    6


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 प्रकृति की अप्रतिम छवि ,

 देखता जब मानस मराल। 

 रूप गुण के सन्तुलन को ,

 निरख मन होता निहाल। 

 चित्रकर्मी तो अनुकृति से ,

 बस यही करता सवाल। 

शाश्वत तुम्हारा यह रूप है ,

या तूलिका का है कमाल। 

चिर प्रतीक्षित स्वप्न अब ,

साकार सा होने लगा है। 

अज्ञात रचना का विषय 

स्पष्ट अब होने लगा है। 

अनगिनत रंग तूलिका से

चित्र तक आये अभी तक। 

 पर पूर्णता आयी न उनमें ,

व्यर्थ हुए अंदाज वे सब। 

कौन कब आये इधर ,

बैरी बनी है आज निद्रा। 

दौड़ते कितने भ्र्मर अब,

देखकर आहवान मुद्रा।

रंग चित्र कमाल

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