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गज़ल
गज़ल
★★★★★

© Saurabh Sharma

Drama

1 Minutes   628    8


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तुमको फिर अब मैं मनाऊँ कैसे,

पुराने वो लम्हे फिर लाऊँ कैसे !


अरसो का साथ हुआ करता था,

अब तनहा अकेला रह पाऊँ कैसे !


वस्ल-ए-दिल अपना होगा की नहीं,

झूठा दिलासा ख़ुद को दिलाऊँ कैसे !


ज़िंदा ये यादें अगर रह भी गयी तो,

महरूम फिर इनको अब बनाऊँ कैसे !


ज़ुल्म ये कैसा ढा दिया क़िस्मत ने,

बे-खुदी के क़िस्से अब सुनाऊँ कैसे !


अब तो मुकद्दर भी संग नहीं 'सफ़र',

उनको वापस क़रीब फिर बुलाऊँ कैसे !

ग़ज़ल साथ बिछड़ना

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