Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
समाजवादी धर्म
समाजवादी धर्म
★★★★★

© Dipak Mashal

Others

2 Minutes   14.4K    7


Content Ranking

खानाबदोश उत्पादन इकाइयों 
 
क्यों नहीं अपना लेतीं तुम धर्म 
 
धर्म समाजवाद का  
 
कि फ़ैल जाओ हर कोने में विश्व के 
 
देने को सबको रोटी सबको कपड़ा और मकान 
 
भटकती हो सस्ते ख़ून-पसीने की खोज में 
 
कभी भारत, चीन, वियतनाम, कम्बोडिया, टर्की 
 
कभी श्रीलंका, बंगला देश 
 
तो कभी यूरोप के इलाकों में 
 
क्यों बनती हो मेहमान चालबाज़ियों की 
 
देती हो मौक़े एक को 
 
और बाक़ियों को भूखों मरने पर करती मजबूर  
 
लालचों की बनती सहभागी 
 
औरों के हक़ को रौंद 
 
कहीं बेरोज़गारी 
 
तो कहीं कामकाजी हाथों की कमी 
 
जन्मती तुमसे 
 
तुमसे ही पैदा होते गैरदेशियों को खदेड़ने के झगड़े 
 
क्यों नहीं बाँट लेती तुम 
 
अपने-अपने क्षेत्र 
 
कच्चे माल के नज़दीकी भंडारों से विमर्श कर 
 
जिससे बनी रहे दुनिया एक जगह 
 
जो प्रेम जानती हो 
 
जो नफ़रत सिर्फ़ नफ़रतों से करती हो 
 
और प्रेम तब उगता है 
 
जब कोई बस्ती नंगी न रहती हो 
 
जब आँतों में भूख न सोती हो 
 
जब ओस और धूप से बेफ़िकर हों आँखें 
 
जब जातियाँ अनपढ़ न भटकती हो 
 
न मानती हो जो सूरज या चाँद को देवता 
 
न ढूँढती हो बदहाली की बुनियादें
 
हाथों की लकीरों 
 
और पैदा होते वक़्त के नक्षत्रों में
 
ओह तुम भी तो मजबूर हो न 
 
कि कहने को तुम्हारे आका आदमी ही हैं 
 
और आदमी आदमी की ख़ातिर 
 
सच्चे धर्म कब अपनाता है 
 
कविता ख़त्म नहीं होती कभी 
 
जापानी नदी की तरह हो रही होती है 
 
ईश्वर तुमसे कितना प्यार करती है दुनिया 
 
और मैं जल जल जाता हूँ 

समाजवादी धर्म

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..