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Pulkit Khokha
1 month ago

बढ़िया...........

1 month ago

बढ़िया...........


Jasmeet Nagpal
3 months ago

wow

3 months ago

wow


Saurabh Sharma
3 months ago

nice...

3 months ago

nice...


hemant kumar
2 years ago

तुम मुझे ज़ंजीरों में बाँधोगे पर मैं उन बंधनों को तोड़ूँगी. अग्नि में जलकर भी,मैं खिल उठूँगी. सृष्टि हूँ मैं,संपूर्ण हूँ मैं. हर दफ़ा, हर बार,हर समय,आगे बढ़ूँगीं मैं.---- एक बेहतरीन और आशावादी विचारों वाली कविता जिसमे आज के समाज के एक भयावह यथार्थ को भी दिखलाया गया है. हम आज इतना पढ़ लिख कर भी लड़कियों को उनका हक़ नहीं दे रहे....ऐसी स्थितियों में कम से कम इस रचना के माध्यम से लड़कियों की वास्तविक हालत को कवयित्री ने बहुत खूबसूरती से बयां किया है.----डा०हेमन्त कुमार

2 years ago

तुम मुझे ज़ंजीरों में बाँधोगे पर मैं उन बंधनों को तोड़ूँगी. अग्नि में जलकर भी,मैं खिल उठूँगी. सृष्टि हूँ मैं,संपूर्ण हूँ मैं. हर दफ़ा, हर बार,हर समय,आगे बढ़ूँगीं मैं.---- एक बेहतरीन और आशावादी विचारों वाली कविता जिसमे आज के समाज के एक भयावह यथार्थ को भी दिखलाया गया है. हम आज इतना पढ़ लिख कर भी लड़कियों को उनका हक़ नहीं दे रहे....ऐसी स्थितियों में कम से कम इस रचना के माध्यम से लड़कियों की वास्तविक हालत को कवयित्री ने बहुत खूबसूरती से बयां किया है.----डा०हेमन्त कुमार


Trisha Sinha
2 years ago

A beautiful poem!!!! Practically true n well said!!...

2 years ago

A beautiful poem!!!! Practically true n well said!!...

Anonymous
2 years ago

Ty

2 years ago

Ty