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© दयाल शरण

Inspirational Others

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शहद से मीठे रस में भीगे,

नभ से बूँद बरसने दो,

सावन ने दस्तक तो दी है,

धरा को उपवन होने दो।


फिर मत टोको नभ को,

और ना ताने घन को यूं दो,

अभी तो रिम-झिम धूल हुई है,

अब्द को ज़रा सा खिलने दो।


गर्मी, सर्दी, बरसातों की आमद,

कड़ी है कड़ी को रहने दो,

स्वागत का निमित्त बनो तुम,

अपलक पल को ढलने दो।


मन की पीड़ा, तन की चिन्ता,

भाव कहाँ स्थायी हैं,

थोड़ा सा तुम करवट बदलो,

थोडी फिजा बदलने दो।


शहद से मीठे रस में भीगे,

नभ से बूँद बरसने दो,

अभी तो रिम-झिम धूल हुई है,

अब्द को ज़रा सा खिलने दो।

कविता प्रकृति नभ बारिश धरा उपवन

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