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औरतें
औरतें
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© Sumita Keshwa

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जमीं रहें अपनी जड़ों से औरतें

इसलिए बनाए रखो ऐसी जमीन

जो दे सके उनकी जड़ों को मजबूती

औरतें पनपती हैं तो पनपा जाती हैं

उजड़ती हैं तो उजाड़ जाती हैं

सभी की जड़ों को संभाले

न जाने कौन से अनाम क्षणों में

कमजोर हो जाती हैं औरतें

फल-फूल से लदे रहने के बावजूद

न जाने कौन सी डाली रिक्त रह जाती है

जिसे सींचने की खातिर वह

अपनी जमीन से ही बगावत कर उठती है

हिला देती है अपनी जड़ों को अनजाने ही

थपथपाए रखो उसकी जड़ों की मिट्टी को

लीप दो उर्वरक से ताकि दरारें न पड़ जायें

आत्मघाती होती हैं ये दरारें

दीवारों में पड़ जाए तो टूट जाती हैं दीवारें

दरवाजों में पड़ जाए तो चीर देती हैं

दरवाजे के पल्लों को

रंगाई-पुताई में पड़ जाए तो पपड़ी बन

उखड़ जाती हैं अपने ही अस्तित्व से

जमीन में पड़ जाए तो भूकंप ले आती हैं

समंदर में पड़ जाए तो सुनामी ले आती हैं

आसमान में पड़ जाए तो बादलों को

फटने पर मजबूर कर देती हैं दरारें

जानती हैं औरतें बहुत खतरनाक होती हैं दरारें…

इसीलिए रोज चूल्हा बुझते ही

गर्म आंच से पड़ने वाली दरारों को

झट से लीप देती हैं मिट्टी और गोबर की लेपन से 

भर देती हैं चूल्हे की दरारें

ताकि दरारों से होने वाले नुकसान से बचा जाए

किन्तु नहीं बचा पाती वे खुद को उन दरारों से

जो दबे पांव न जाने कब दरका जाती है उन्हें

सभी की जड़ों को संभाले हुए

जाने-अनजाने फट पड़ती हैं वे

अपनी ही जड़ों की दरारों से बेखबर……

#hindipoem #poetry

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