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परम्परा
परम्परा
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© Shubham Srivastava

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आज पत्थर हूँ
मगर
न रहूँगा देर तक

मुझे भी मिलेगा
एक दिन
छेनी-हथौड़ी थमा हाथ

हर चोट से निखरकर
बनता जाऊँगा इक देह

और फिर
मैं भी थामूँगा
"छेनी-हथौड़ी"
मेरे जैसे ही
किसी पत्थर के लिये।

 

 

 

 

परम्परा कविता

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