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तिल
तिल
★★★★★

© Arpan Kumar

Romance

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तुम्हारे अधर के तिल से
मेरी उँगलियाँ
और तुम्हारी जंघा के तिल से
मेरे अधर संवाद करते हैं

उन्हें बातें करने दो आपस में
और आओ हम दोनों
टहलने चलें
कुछ दूर यहाँ से
बगल के पार्क में
ताकि वे किसी अहं, मूल्य
और अंतर्विरोध से मुक्त
बने रहकर भारहीन
प्रेमरत रहें
एक दूजे से

तुम्हारी बायीं
कदली-जंघा का तिल
कुछ ऐसा है मानों
वासना की तेज धार वाली
किसी चाकू की नोंक
उसपर चुभोई गई हो देर तलक,
चिकनी त्वचा से लगकर
उभरकर उसके बीच
वही तिल
आमंत्रित करता है अब
अपनी तरफ
तुम्हारे प्रेम पुजारी को

तुम अपनी जंघा
अनावृत करती हो
और प्रेम का पुजारी
एक वासना पुरुष बन जाता है
वह दो मांसल देवदारों के बीच
बहते झरने में डूब जाता है
एक तिल की बिसात
कुछ ऐसी ठहरती है
सदियों की प्रेम साधना
क्षणांश में वासनामयी
हो जाती है

तुम्हारे अधर से जब
प्रेम-सुधा टपक रही थी
और मैं अपने नयन बंद किए
पिए जा रहा था उसे
भाव विह्वल उन घोर
एकान्तिक क्षणों में
तब उसकी कोई एक बूँद
थमी रह गई थी
तुम्हारे शीर्ष होंठ पर
मेरे अधर उसका पान
नहीं कर पाए थे तब
और वह तब से अटकी पड़ी है
उसी जगह
मैं बार बार उसे पीना चाहता हूँ
मगर अब वह अपनी जगह पर 
अड़ी मेरी प्यास को बढ़ाती है
इस क्रम में मैं अबतक
तुम्हारे अधर का
सारा अमृत कलश
पी चुका हूँ
खाली कर चुका हूँ कई कई बार
मगर यह बूँद
अपनी जगह कायम है
और स्रोत है शायद
तुम्हारे भीतर के
अनंत अमृत कलश का

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं
कि तुम्हारे इन दो तिलों ने
तिल का कुछ ऐसा पहाड़
बनाया कि
मेरा प्रेम उसके नीचे
कहीं दब गया है
मैं आता हूँ तुम्हारे पास
प्रेम के वशीभूत
और तुम्हारे ये तिल
मुझे वासना पुंज में बदल देते हैं

आओ हम दोनों
इस सावन में खूब नहाए

फूलों के
बीच टहलें
और इन्हें यूं ही संवादरत
अकेला छोड़ दें
तुम्हारे बिस्तर पर
जिनपर बड़े मनोयोग से
तुमने कई बेल बूटे काढ़े थे
अपने कौमार्य के
मनचले दिनों में

इसके पहले कि
तुम्हारे ये तिल
हमें तिल-तिल करके
अनंत कामना की आग में जलाए
इससे पहले कि
बहुत देर हो जाए
और निकलने का कोई
अर्थ न बचे
आओ हम कमरे से बाहर
आ जाएँ

सोचता हूँ
और फिर पूछता हूँ तुम्हीं से
ये तुम्हारे तिल हैं
या कोई वियाग्रा

तुम कुछ नहीं बोलती
मेरी ओर एकटक देखती
अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से
बस गुलाब की एक टहनी को
अपनी ओर खींच
उसके सुर्ख लाल एक गुलाब को
अपने ऊपरी होंठ से
छुआ लेती हो

और हँस देती हो

मेरे चषक में चाँद की तरह
देर तक तिरते हैं
तुम्हारे ये तिल...

प्रेम के घोर एकांतिक क्षणों में रची एक मांसल कविता...

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