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तू जीने दे ज़रा
तू जीने दे ज़रा
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© Nikhil Sharma

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आँखों से बहती, अश्कों की धारा,
ग़म में था कैद, जीवन सारा,
आई एक ख़ुशी की फुहार है ||
बदला है कुछ, यह समाँ,
कुछ अनकहा सा, इज़हार है || 
बस इतनी सी, ये गुहार है |
इस वक़्त को, इन लम्हों को, 
तू जीने दे ज़रा ||

तन्हा थे हर, महफ़िल में,
नासूर ही थे, मंज़िल में ||
ख़ुशी अब, लौट के आई है,
मिटी, मायूसी की, परछाई है,
हर मौसम, अब बहार है ||
इन बहारों को, इन फ़िज़ाओं को,
तू जीने दे ज़रा ||

इश्क मुझको है हुआ,
है गुनाह यह, तो क़ुबूल है || 
गलत है यह या है सही,
सोचे ज़माना, जो फ़िज़ूल है || 
इस एहसास को, हर साँस को,
उसकी मुस्कान को, उसके हर एक अंदाज़ को,
तू जीने दे ज़रा ||

qubul fizul ahsaas

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