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पर्यावरण
पर्यावरण
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© ✍ कुलदीप पटेल के•डी

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धरती आकाश गगन में

फैला जग सारा है,

यहाँ न कुछ तेरा न मेरा

और न कुछ हमारा है,

सब कुछ उसका है

सब कुछ उससे है,

पलता जिससे जग सारा है

जो है फैला चारो ओर आवरण में

जिससे है हम वो पर्यावरण हमारा है !


सदा है हम जिनमे रहते

फिर संग क्यूँँ नही उनको रखते ?

जिनका हमसे न कोई नाता है

फिर उनके संग क्यूँँ इतने रंग बदलते ?

सब कुछ होकर भी उनपे हम निर्भर रहते

वो क्यूँँ कभी कुछ हमसे नही मांगा करते

बस बहुत हो गया अब एक रिश्ता बनाओ

गर्व से उठ सब मिल पर्यावरण बचाओ !


देख व्यवहार कुदरत भी

इंसान से घबराया

मैंने तुझे बनाया

और तूने कर दिया मुझे पराया

मैंने धरती को जन्नत बनाया

लेकिन तू रहकर भी समझ न पाया

बस बहुत हो गया अब समझो और समझाओ

गर सुखमय जीवन बनाना है तो पर्यावरण बचाओ



क्यूँँ फैलाते हो कहर प्रदूषण का ?

क्यूँँ कर रहे विनाश धरती माँ का ?

क्यूँँ बना अपना घर उजाड़ते हो घर किसी परिंदे का

क्यूँँ बना रहे मौत का कारण अपनी ज़िंदगी का

बस बहुत हो गया अब नही किसी का घर उजाड़ो

न ही किसी को और सताओ !

मिलकर रहना है सबको साथ तो पर्यावरण बचाओ !

Nature Pollution Humanity

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