Quotes New

Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
मुआफ़िक रबड़ के खिंच कर सुबह जो, शाम होती है
मुआफ़िक रबड़ के खिंच कर सुबह जो, शाम होती है
★★★★★

© Prem Sahil

Others

1 Minutes   13.2K    8


Content Ranking

मुआफ़िक रबड़ के खिंच कर सुबह जो, शाम होती है

थके दिन के लिऐ आराम का पैग़ाम होती है

चमक बच्चों के चेहरे पर नज़र आती है जो अक़्सर

वो माँ-बाप की कोशिश का ही अंजाम होती है

ऐसा दौर है, सुबह कोई निकले कमाने 'गर

बहुत कम किसी की कोशिश कभी नाक़ाम होती है

बिगाड़े बिन किसी का कुछ भी, हो जाती है जो रंजिश

सँवारे से भी वो रंजिश कहाँ तमाम होती है

डरना किस से है, और क्यों है डरना, आजकल साहिल

बुरी से बुरी वारदात सरेआम होती है।

मुआफ़िक रबड़ के खिंच कर सुबह जो शाम होती है

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..