Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
सहेली
सहेली
★★★★★

© Dheeraj Dave

Others Classics

1 Minutes   13.1K    3


Content Ranking

तुम्हारे माथे पर पड़ी ये झुर्रियां 

यूँ लगता है जैसे

उन्नत हिमालय को काटकर 

बह रही है बीसियों नदियाँ

तुम्हारे ये अनगिनत सफ़ेद बाल

यूँ लिपटते है तुम्हारे चेहरे से

ज्यों किसी प्रकाश पुंज पर 

बिखरे पड़े हो धवल रेशे

तुम्हारी आँखों के चारो और बन गए है काले घेरे

ठीक वैसे ही जैसे चाँद को घेरे हुए हो

चांदनी का वृत्त

तुम्हारी उफनती छाती से खीँच लिया है

तुम्हारी कोख ने दूधिया सोना

न वो कमर की लचक

न नितम्बो की थिरकन

तुम्हारी जांघे जो कभी देवदार थी

अब जूना सागवान लगती है

कभी स्वर्णआभा थी तुम

अब महज़ मिट्टी हो

मगर इस मिट्टी में अब भी लहलहाता है

मेरी प्रीत का पौधा

मेरी आँखों को अब भी सुहाता है तुम्हारा चेहरा

फिसलती उम्र के बाद भी

बिल्कुल नया हूँ मैं अब भी

और तुम

अब भी कोई नवयौवना लगती हो

मेरे बचपन की सहेली

सहेली हिंदी तुम

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..