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माँ और पिता में श्रेष्ठ कौन
माँ और पिता में श्रेष्ठ कौन
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© Sushil Sharma

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स्वर्ग, धर्म और तपस्या
पिता के रुप हैं।
तीर्थ, मोक्ष और ईश्वर
माता स्वरुप हैं।
संतान के भौतिक जगत
के अधिष्ठाता पिता हैं।
संतान के आतंरिक जगत
की स्वामिनी माता है।
पिता कुम्हार का मुंगरा
जो देता है बाहर से चोट
ताकि हमारा व्यक्तित्व
चमक कर निखरे।
माँ स्नेह का वह अविरल स्त्रोत
जो जीवन को स्पंदित करता है
ऊर्जा और प्राणशक्ति से।
पिता एक सुदृढ़ चट्टान
जो खड़ी होती है दुखों और
संघर्षों के सामने अविचल
हमारी सुरक्षा कवच बन कर।
माँ निर्झर कल-कल बहती नदी
जिसमें संताने धो लेती हैं
अपने सारे दुख दर्द संताप।
पिता उतुंग शिखर जो रोकता है
कठिन तूफानों को
हम तक पहुंचने से पहले।
माता उपवन की माली की तरह
प्रेम की मिट्टी, स्नेह की खाद
ममता का पानी देकर।
उगाती है हमें पुष्पों की तरह।
अनुशासन, निर्देश, कवच
डर, व्यक्तित्व, सहयोग का
भौतिक स्वरुप पिता हैं।
आंसू, मुस्कान, प्रेम, मोह
सुरक्षा, स्नेह, श्रृंगार मिलाओ
तो माँ की तस्वीर बनती है।
माता पिता एक कवच है।
जो आंधियों और झंझावातों
से जूझकर कठिन पथरीली
राह में हमारी उंगली थामे
सदृश्य या अदृश्य रूप से हमें
ले जाते हैं हमारे लक्ष्य की ओर
माता पिता एक एहसास है
ईश्वरीय सत्ता का प्रतिभास है
माता पिता संकल्प हैं
हमारे विकल्पों का।
माता पिता संतान की जीवन
रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं।
दो आंखे हैं, दो हाथ है, दो पैर हैं
किसी एक के न होने से
जीवन घिसटता है दौड़ता नहीं
इसलिए मेरे लिए दोनों श्रेष्ठ हैं।
न एक तिल कम न एक तिल ज़्यादा।

माता-पिता

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