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बचपन की यादों में
बचपन की यादों में
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© Sanjeet Kumar

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मुझे बचपन की यादों में रहने दो

अकेले गाँव की गलियों में दौड़ने दो

झूठे ही सही मगर वो सपने देखने दो 

ज़िंदगी के दो पल उन सपनों में जिने दो

मुझे बचपन की यादों में रहने दो

मुझे भी भागने दो, उस कटी पतंग के पीछे

दुनिया से बेख़ौफ़, ज़माने से बेपरवाह

मुझे भी लहरों के संग तैरने दो, कागज़ कि उस कश्ती के संग रहने दो

मुझे बचपन की यादों में रहने दो

न दिखाओ, मुझे जवानी की रंग रलियों को

न समझाओ, मुझे दुनिया के रस्मों रिवाज़ों को

न उलझाओ, मुझे सुलझे सवालों में

न चिपकाओ, मुझे शहर के दिवारों पे

बस, मुझे बचपन की यादों में रहने दो

गाँव के चौपाल पे जमात लगाने दो

दादा-दादी के गोद में सर रख़ कर सोने दो

उन कहानियों में फ़िर से खोने दो

मुझे बचपन कि यादों में रहने दो

रहने दो, मुझे गाँव की उस घूल-कण में

रहने दो, मुझे बगीचे के उन फूलों में

मुझे बचपन की यादों में रहने दो

अब कोई मुझे शहर से ले जाये

गाँव के खे़तों में छोड़ आये.

बचपन

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