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मैं प्रेम में हूँ
मैं प्रेम में हूँ
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© Rajkumar Kumbhaj

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मैं डूब रहा हूँ

और पा रहा हूँ प्राण

मैं प्रेम में हूँ .

हवा सुलगा रही है आग

और भस्म हो रहा है हरा-भरा बाँस-वन

मैं प्रेम में हूँ .

नदी भाग रही है

आतुरता बड़ी है , मिलना है समुद्र से

बीच में काटे हैं , पत्थर हैं , खाप पंचायतें हैं

मैं प्रेम में हूँ .

पृथ्वी बहका रही है मुझे

और वस्त्र जो हरे हैं मेरे , हरा रहे हैं मुझे

मैं प्रेम में हूँ .

सूर्य की क्या कहूँ ?

और कि बेहद कठिन है कहना कि देह है सूर्य

मैं प्रेम में हूँ .

मैं प्रेम में हूँ .

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