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ऐ मासूम
ऐ मासूम
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© Sanjay Sharma

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तख़्त-ताज़ों के मंज़र तो कई और भी हैं

क्यूँ इतना रुतबा ज़ाया किया

जी ले ज़रा सी ज़िंदगी ऐ मासूम

क्यूँ रब, इश्क़ और मुहब्बत से किनारा किया।

 

रुसवाइयों को भुलाने का ये कैसा आग़ाज़?

की दिलों को बेगाना, ज़ार ज़ार कर लिया

जी ले ज़रा सी ज़िंदगी ऐ मासूम ...

 

सामानों के ज़ख़ीरे, हुकूमतों कि कवायदों के

ये कैसे ख़ालिस मरीज़?

की आशिके सोहबतों का जनाज़ा निकल गया

जी ले ज़रा सी ज़िंदगी ऐ मासूम ...

 

नूर है, शबाब... बहारे इश्क़ भी

बंदिशों के रखवालदारों ने हुस्न को तल्ख़, बेबस...जर्जर कर दिया

जी ले ज़रा सी ज़िंदगी ऐ मासूम ...

 

ज़ोर आजमाइशों की सियासतें गोया क्या कम हैं

जो हुनर और दिमागदारों के बाज़ार में

बदनसीब ग़रीबों को गले लगाना भुला दिया

जी ले ज़रा सी ज़िंदगी ऐ मासूम

 

क्यूँ रब के बेइंतहा ख़ज़ानों से किनारा किया।

 

मासूम रब इश्क़ मोहब्बत

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