Sonam Kewat

Abstract


Sonam Kewat

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वो बंद किताब है

वो बंद किताब है

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वो सब को समझ नहीं आती क्योंकि, 

सुना है वो कोई बंद सी किताब है।

राज यूँ खुलते नहीं उसके सारे, 

भले लगा लो कितने भी हिसाब है।


कुछ दबे राज थे सभी के जैसे, 

जो आज उसने खुद ब खुद बोलें हैं।

एक बंद सी शख्सियत थी कभी, 

अब उसे उसने खुद ही खोलें हैं।


पहला पन्ना जो किस्से खुला, 

तो नाम कुछ तुम्हें लिखा मिला।

वो नाम आजकल बदनाम हैं, 

हा, अब उनका क्या काम है।


पलटा पन्ना जो तो फिर क्या, 

खास कुछ तुम्हें वहा भी दिखा।

प्यार और धोखे के तजुर्बे में,

उसने अपने दर्द को था लिखा।


अगले कुछ पन्नों पर देखा तो, 

उसके संघर्ष की ही कहानी थीं।

किसी और की नहीं थीं बल्कि, 

लिखने वाले की ही जुबानी थीं।


अंतिम पन्ने पर दिखा कुछ खास, 

वो जीत और हार की अभिलाषा है।

उसने अनाथ आश्रम खोला है, 

और सभी के जीने की वो आशा है।


अब दौर ऐसा है कि वो लिखती नहीं, 

लोग उसके बारे में लिखते हैं। 

किस्से नए नए उसकी जिंदगी की, 

हर दूसरे पन्ने पर मिलतें हैं।


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