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एक दिन वो होता है
एक दिन वो होता है
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© Pravesh Soni

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धैर्य चुक जाता है 
एक दिन
नदियों का 
उफन पड़ती है 
तोड़ कर तट बंध

धरा उगलती है लावा 
भीतर की उथल-पुथल को 
जब थामते हुए थक जाती है ।

बदल जाती है 
हाँ, ना में 
असह्य हो जाता है 
एक दिन 
सर झुका कर "जी हाँ "कहना

नीलकंठ कर उठते ताण्डव
एक दिन 
जब ज़हर उगलने लगते हैं 
सुर-असुर के भेद

एक दिन वो होता  ही है 
जिसे चीन्हता नहीं कोई 
पर होने की वजह 
बनता रहता है धीरे-धीरे।

#poetry #hindipoetry

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