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देश के भविष्य का क्या भविष्य है?
देश के भविष्य का क्या भविष्य है?
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© Vaibhav Dubey

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हिकारत भरी नज़रें मिली बस और मिला है क्या।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

माँ के आँचल, पिता के कांधे से भी दूर हो गये।
हम दर-दर भटकने को भी मजबूर हो गये।
ऊँगली पकड़ कर चलने का मौका भी न मिल सका।
फिर गिर कर संभल न पाए इसमें हमारा दोष क्या?
अभी ज्ञान ही नहीं हमें, तो दें इम्तिहान क्या?
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

उम्मीदों के दिए आँखों में सुबह से जलाते हैं।
और शाम होते-होते वो दिए बुझ भी जाते हैं।
फिर वही अँधेरा और वही ख़ामोशी होती है।
घुटनों में दबे पेट में भूख दम तोड़ देती है।
बेबसी की आग को पानी से बुझा दिया।
और फिर सुबह की आस में खुद को सुला लिया।

गर यही ज़िन्दगी है तो ऐ मालिक, जन्म क्यों दिया।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

माना की कपड़े गंदे मगर हर एहसास रखते हैं।
नहला कर देखो प्यार की बारिश में हम दिल साफ़ रखते हैं।
मंदिर में नारियल मजार पर चादर चढ़ाते हों।
गुरूद्वारे में धन और गिरजाघर में मोम जलाते हों।
धर्म के नाम पर होते यहाँ हर रोज चंदे हैं।
कभी हम पर भी नजर डालो हम उसी के बन्दे हैं।

शायद आएगी खुशियों की कभी कोई रात क्या।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

आकर थाम लो हमारे ये लड़खड़ाते हुए कदम।
अभी तो कच्ची माटी हैं जैसा बनाओ बन जायेगें हम।
राम, रहीम, गुरु, विलियम कोई भी नाम दे दो।
रक्त का रंग तो एक ही है उसी में ढल जायेंगे हम।
ममता की गोद में अब हमें झुला झुलाओ तो।
तरस रहे हैं हम कोई बेटा कह कर बुलाओ तो।

वक़्त की आँधियों में बुझ न जाए ये दिया।
हम देश के भविष्य हैं हमारा भविष्य क्या?

आजकल कई बच्चे बाल मजदूरी शोषण अराजकता भीख मांगने आदि के शिकार हो रहें हैं ये कविता उन्हीं बच्चों के मुख से कहे गए शब्द हैं।

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