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पाखंडी
पाखंडी
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© Rajeev Thepra

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दरअसल जीवन

को खोते हैं हम 

जीते तो कतई ही नहीं 

जो चीज़ भी हमारे पास है

जो चीज़ भी हमारे हाथ में हैं 

उसके मालिक नहीं बल्कि

उसके समूचे गुलाम हैं हम 

चीजें हमें नचातीं हैं 

ईश्वर नहीं...

नाचते-नाचते अधमरे हो

जाते हैं हम 

किन्तु फिर भी

थकते नहीं कतई 

मैं चकित होता रहता हूँ 

हमारे जीवन जीने के

तरीकों पे

मेरे खुद के तरीके पर....

परिस्थिति की विवशता

और बात है 

किन्तु आदतों के बाइस 

खुद को पगलाए रखना 

बहुत बड़ी मूढ़ता हैऔर

हम खुद को कभी

मूढ़ समझते ही नहीं 

जीवन पल-पल रिसता जाता है 

जीवन हमसे बिसराता जाता है 

हम जीवन से दूर खड़े जीवन

जीते हैं मरते हुए से 

दूसरों के लिए हमारी घृणा 

और हमारी प्रतिस्पर्धा भी 

महज इसी कारण तो है ना 

कि हमें लगता है 

वो हमसे बेहतर है,और 

हमें उससे आगे

निकलना चाहिए 

इस तरह साहचर्य

छूटता जाता है

वैमनस्यता बढ़ती जाती है 

और इस तरह 

इक दुराव को जीते 

और फिर उसे छिपाने का

प्रयास करते 

पांखडियों से जीते हैं हम 

मगर कौन माने कि

हम पाखंडी भी है....

जीवन की सुंदरता

कभी-कभी ही भर 

उजागर होती है हममें 

वो भी तब ,जब 

मनमाफिक होता है हमारे 

वरना तो 

एक-दूसरे की प्राणों के शत्रु हैं हम

प्रकारांतर से खुद अपनी ही 

जान के दुश्मन हैं हम ....

 

जीवन मालिक गुलाम पाखंड

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