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आधुनिक दोस्ती
आधुनिक दोस्ती
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© SHUBHAM KUMAR

Tragedy

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जख़्म वैसे ही ना भरे थे दिल के,

उस पर एक और गहरा वार कर गयी।

जो मिल गया उसे एक नया हमसफ़र,

हमारी दोस्ती को दरकिनार कर गयी।


अरे वो क्या जाने दोस्ती का मतलब,

जो पलभर में मतलबी हो गयी ।

हमने जो वक्त गुजारे थे साथ में,

उसे मझधार में छोड़, दोस्ती तोड़ गयी।


अरे कोई नही ! अब जा तू बस खुश रह,

शायद मुझसे ही कुछ भूल हो गयी।

भूल जाऊँगा उस दोस्ती को

एक सपना समझ कर।


वैसे भी अब भुलना-भुलाना

तो एक आदत सी हो गयी।

दोस्ती सपना खुश

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