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ज़र्द पत्ते
ज़र्द पत्ते
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© Sandeep pandey

Tragedy

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सुबह ए शबनम गिरी ज़र्द पत्तों पे जब, नातवाँ शाख़ से ही फ़ना हो गया।

सब्ज़ रंग था कभी यूँ तो सावन में तू, अब जमीं ही तेरा आसमाँ हो गया।


दिया जलता रहा राह तकता रहा, वो ना आए तेरा रतजगा हो गया।

हमदम तेरा हमराह दुश्मन हुआ, वक़्त बदला तेरा क्या से क्या हो गया।


लोग कहने लगे चाँद कासुफ़ हुआ, तू ज़रा सा भी जो मेह-लख़ा हो गया।

उनकी ज़िद है हंसने ना देंगे मुझे, मैं ख़ुद ही मेरा मसख़रा हो गया।


मेरा दुश्मन मुझे कम समझता रहा, इससे दुगना मेरा हौसला हो गया।

पांव रखे उसने इस ज़मीं पे जो कल, लोग कहने लगे ज़लज़ला हो गया।


रंग ए तबीयत उसकी बदलती रही, कल मैं था अब कोई दूसरा हो गया।

मुहब्बत है क्या ये मुझे क्या पता, बस यूँ ही कभी ये हादसा हो गया।


है ज़ाहिद का क्या मस्त रहता है वो, एक़ पैमाँ लिया शादमाँ हो गया।

दुश्मन रंग हौसला जलजला सावन शबनम हमदम मुहब्बत चाॅंद जाहिद

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