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विजयरथ
विजयरथ
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© Nikhil Sharma

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विजयरथ, प्रगतिपथ, खून से है लथपथ |
विजयगाथा लिख नई, कर मेहनत तू सतत् ||
मंजिल है जब एक, मन में क्यों है द्वेष |
देश तो है एक, क्या हुआ अलग जो है वेश ||
ईर्ष्या को तू अर्थ न दे, द्वंद की तू बात कर |
विजयतिलक उसी का है, जो बढे स्वार्थ त्याग कर ||
अंतर्मन में जो तू ज्ञानदीप जगा सके |
प्रकाश मन में वो करे, जो मन तमस हटा सके ||
वो महानता किस काम की, जो पौरुष न दिखा सके |
वो शक्ति भी व्यर्थ है, सहस जो न जुटा सके ||
तू है असीम, अनंत है, तेरी योग्यता प्रखर |
सवार हो तू विजयरथ पे, जीत विश्व का समर ||
जीत विश्व का समर ||

swarth vijayrath tyag prakash

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