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"भूख़ ---- भीख़ और भरोसा "
"भूख़ ---- भीख़ और भरोसा "
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© Anupam Tripathi

Inspirational

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"भूख़ ---- भीख़ और भरोसा "

उस भूखे बच्चे की भूख ने मुझे सिखाया , कि सीख  सिर्फ़ किताबों का हिस्सा नहीं  

" मेरा क्या है ?
कम खाऊँगा तो मर नहीं जाऊँगा !
पर ; उन्हें तो ज़िन्दा रखना है !!
: मेरा यही ; एकमात्र सपना है......."

किसे पता चलता !
यदि "वह " लड़का 
मलिन जिस्म की फटेहाल जेब में 
" उन दो रोटियों में से ...............
..................एक अंदर न रखता".
: जेब में कुल तीन रोटियाँ थीं..."
आदमी आगबगूला और
लड़का ; भयग्रस्त काँप रहा था .

------ "रसाले ; तेरी मासूमियत पर
तरस खा कर रोटियाँ दी हैं 
और तू ! उन्हें जेब में छुपा रहा है ?"
--------" बता ; कहाँ बेचेगा इन्हें ?"
--------" आखिर ; किसके लिऐ बचा रहा है ??"

चारों ओर जुट आई भीड़ के तंग घेरे में 
लड़का ; घिरने लगा
भीड़ के आक्रोश और सवालों की बौछार में 
लड़का ; सिहरने लगा.

--------- " बाबूजी !
घर में ; माँ ....... बहुत बीमार है
मर चुका है ---------- मेरा बाप
" नन्हीं मुनिया" ; भूख़ से बेज़ार है "

-------- " मेरा क्या है ?
कम खाऊँगा तो मर नहीं जाऊँगा !
पर ; उन्हें तो ज़िन्दा रखना है !!
: मेरा यही ; एकमात्र सपना है......."
----- "माँ की दवा के लिऐ ; पैसे नहीं हैं --- मेरे पास
...... बिक चुका है ; घर का सारा सामान ........
छोटा हूँ न; इसीलिऐ नहीं मिलता ---- कोई काम"

----- " यही; "तीन रोटियाँ " हैं : मेरी आस
भूखी है : बहना और माँ ------ ज़िन्दा लाश".

मुझे लगा ; ------------------------------
समर्थ हो कर भी मैं ; उसके सामने बहुत बौना हू
: नियति के हाथ का खिलौना हूँ .......................

मैंने ; उसका सिर प्यार से थपथपाया
: सीधा घर चला आया .......,..........

बीमार पिताजी ; अरसे से चिकित्सक के पास
ले जाने की ज़िद कर रहे थे
मेरी बेरुख़ी और ओढ़ी हुई व्यस्तता के बीच
उपेक्षा की यंत्रणा भरी 
धीमी -- धीमी मौत मर रहे थे.
 

 

भूख ग़रीबी अनुपम त्रिपाठी

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