Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
मोम के पंख
मोम के पंख
★★★★★

© नवल पाल प्रभाकर दिनकर

Drama

1 Minutes   14.0K    6


Content Ranking

मोम के कोमल पंख लगाकर मैं

क्यों सूरज को छूना चाहता हूँ।

बारूद के ढेर पर बैठ कर मैं

क्यों आग से खेलना चाहता हूँ।

पता है मुझको जीवन मेरा

कांटो से भरा हुआ है,

कांटो भरी राहों पर चलकर मैं

क्यों फूलों की इच्छा रखता हूँ।

मोम के कोमल पंख लगाकर मैं

क्यों सूरज को छूना चाहता हूँ।

हर पल हर क्षण पता नही

कब आँधी कब तुफां आएं

बैठ इस किनारे पर मैं,

किनारा वो पाना चाहता हूँ।

मोम के कोमल पंख लगाकर मैं

क्यों सूरज को छूना चाहता हूँ।

मुझको ये भी पता नही

मेरी मंजिल रा ह कौन है

क्यों फि र रोक हवाओं को मैं

पता मंजिल का जानना चाहता हूँ।

मोम के कोमल पंख लगाकर मैं

क्यों सूरज को छूना चाहता हूँ।

पेट तृप्त कभी नही होता

घास पर ओंस की चंद बूंदों से

क्यों पीकर उन बूंदों को मैं

तृप्ती का आभास करना चाहता हूँ।

मोम के कोमल पंख लगाकर मैं

क्यों सूरज को छूना चाहता हूँ।


Sun Life Experience

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..