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सरहदें
सरहदें
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© Asha Singh Gaur

Inspirational

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बहुत बूढ़ी हैं ये सरहदें

जबसे होश संभाला है

इन्हें यहीं पर खड़ा पाया है।

सुनसान, वीरान, खतरनाक

दूर-दूर तक इनके पास

बस खामोशियों का साया है।

 

जब भी इनपर चहल-पहल होती है

इंसानियत खूब रोती है

बेहती हैं खून की नदियाँ

और ये खामोशी से सोती हैं।

देने के लिए इनके पास कुछ नहीं

फिर भी लाखों मर मिटे इनपर

इनकी हिफाज़त के लिए

जान लुटा गए हँसकर

गूँगी-सी पड़ी हैं फिर भी

अनगिनत कहानियाँ सुनाती हैं

सिसकियों से भरी इनकी हवाएं

हर बार रुला जाती हैं।

 

दोष तो इनका भी नहीं

इन्हें इंसानों ने ही बनाया है

और फिर इन्हें बचाने के लिए

हर ओर पहरा बिठाया है।

गाड़ दिए हैं धरती के सीने में खंबे,

काँटों भरी तार से इसे सजाया है

दौड़ा दिया है तेज़ विद्युत् की लहरों को इसमें

बस आग से ही नहीं जलाया है।

अधमरी सी पड़ी है

इनके दर्द को कौन समझ पाया है

जब भी चाल चली दुश्मन ने,

जवानो को इनपर

मंदिर में फूलों की तरह चढ़ाया है।

 

बदकिस्मती इनकी

कि ये घटती भी तो नहीं

कितने युद्ध झेल गई

पर मरती भी तो नहीं।

कितना अच्छा होता

जो ये बूढ़ी होती

और फिर मर जाती,

पर उम्र के साथ

ये और मज़बूत हो गई है

पहले देशों के बीच होती थी

अब दिलों के बीच भी खिंच गई हैं।

दोष सरहदों का नहीं इन्हें इंसानों ने ही बनाया है

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