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'सेब खाता बेटा'
'सेब खाता बेटा'
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© Arpan Kumar

Inspirational

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मेरा साढ़े तीन साल का दूसरा बेटा

मेरे ठीक सामने

ख़ूब मज़े से सेब खा रहा हैरसोई के ‘स्लैब’ से उतारकर

स्वयं कुर्सी पर चढ़कर,

सेब, जो लाए गए थे

उसकी माँ और नानी के लिए विशेषकर

‘सफला एकादशी’ के दिन फलाहार हेतु

सेब की ठंडी तासीर को देखते हुए

कड़कती सर्दी के इन दिनों में

उन्हें दूर रखा गया था

बच्चों की नज़र और उनकी पहुँच से

मगर आज वह

अपनी खोजी आँखों से टोहकर

और कुर्सी के भरोसे तत्काल बढ़ी

अपनी ऊँचाई का लाभ लेते हुए 

थाम चुका है

एक सुर्ख लाल सेब

अपने नन्हें हाथों में

और अब आकर मेरी मेज़ के पास

खड़ा है वह मुस्कुराता

अपनी भरपूर शैतानी में

और घूरता मुझे

अपनी ढीठ आँखों से

किसी अवांछित को खाने की

कदाचित अनुमति माँगता

वह भी इस तेवर से

जिसमें एक पिता का सिर

सिर्फ़ ‘हाँ’ में ही हिल सकता है

भविष्य के किसी अप्रिय अंदेशे मात्र से

क्षण-विशेष की इस नैसर्गिक, लहलहाती ख़ुशी पर

डपट भरे अपने किसी आदेशमूलक और

अप्रिय निषेध का तुषारापात करना

मुझे कहीं से जँच नहीं रहा था

मगर उसकी नाज़ुकमिजाज़ नाक और

उसके गड़बड़ गले को देखते हुए फ्रीज से

तुरंत निकालकर रखे गए सेब को

खाने की अनुमति देना भी

ख़तरे से खाली नहीं था मैं पसोपेश में था

मगर समुत्सुक बाल-मन की प्रकृत-मेधा ने 

अपनी सुविधानुसार मेरे अनिर्णय को

मेरी सहमति माना

 

मैं अपनी आत्मविस्मृति में

देख रहा हूँ अपने बेटे को अपलक

सेब खाता हुआ

ख़ुद भरता हुआ कहीं आत्मतृप्ति की किसी हुमक से भी,

यह जानते हुए कि

उसे सेब खाता देख

उसकी माँ आग-बबूला हो जाएगी...

वह अपनी सम्मोहक हँसी में

अपने पिता को बाँधे

भरपूर रस लेता हर टुकड़े का सेब खा रहा है

इस सहज विश्वास में

कि उसके पिता बचा लेंगे उसे

उसकी माँ की क्रोधाग्नि से से

दूर-दूर तक इससे अनजान

कि वह एकाध सप्ताह पहले ही

अपनी ‘टांसलाइटिस’ की भयंकरता से

किस तरह परेशान था

और डॉक्टर तो उसके ‘टांसिल’ ही

निकाल बाहर कर देना चाहते थे

आखिर किसी तरह कई दिनों तक

‘एंटीबायोटिक्स’ खा-खाकर

वह बमुश्किल ठीक हुआ था

मगर, पूरी तरह ढीली पड़ चुकी थी

उसकी पाचन-क्रिया इस बीच

दवाइयों के ‘साइड-इफेक्ट्स’ से

सेब पर पड़ते उसके दाँतों के

गहरे निशान उसके अंदर की क्रमशः बढ़ती

दृढ़ता के प्रमाण हैं उसकी जिजीविषा और

दुनिया से अपने तईं

निबटने की तैयारी के भी, 

जबड़ों को भरपूर खोलकर

रखकर दाँतों बीच सेब को 

उसका एक बड़ा टुकड़ा काटना

भूख और स्वाद के अनुरूप

उसका एक परिपूर्ण ग्रास लेना,

उसकी माँ द्वारा चौबीसों घंटे की गई

उसकी परवरिश का सुफल है कदाचित

अपनी समस्त इंद्रियों को एकाग्रचित कर

सेब खाने में तल्लीन

मेरा बेटा पूछता है हठात्

‘क्या सेब में पानी होता है पापा?’ 

मैं उसके होठों पर छलकती

रसदार सेब की बूँदों को देखता हूँ भरपूर

सेब के रस से सराबोर

उसके गुलाबी होंठ

कुछ और गुलाबी दिखते हैं

‘थोड़ा सा मुझे भी दे दो’

मैं छेड़ता हूँ उसे याचक की

दयनीय मुद्रा बनाकर

मगर मेरा बेटा भाँप जाता है

मेरे अभिनय को

और खाने की अपनी गति तेज़

करता एक बार में ही

बाकी बचा सेब गटक जाता है

अपने मुँह में

और चबाकर पूरी तरह उसे

अपने दूधिया मगर कसे दाँतों से

वह जाने-अनजाने अपने विजयोल्लास में

अपने गाल मेरी ओर बढ़ा देता है

मानो कह रहा हो…

‘पापा, तुम फिलहाल सेब-जैसे

मेरे इन दो गालों से ही काम चलाओ।’

............. ...  

#positiveindia

पिता -पुत्र माँ स्वास्थ्य मासूमियत

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