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क्यों
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© Amresh Singh

Inspirational

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भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

कुछ भी लेना नहीं तुम्हें जब 

करते क्यों बाजार की बातें ? 

आते नहीं सामने क्यों 

जो चेहरे हैं असली ? 

मुखौटे में जीवन जीने की 

रीत कहाँ से निकली ? 

परदे के पीछे रहना जब 

करते क्यों संसार की बातें ?

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

अपने पौरुष बल पर क्या 

तुम को नहीं भरोसा ? 

पराधीनता के आगोश में 

क्यों तुम रहे हमेशा ?

सिंहनी के वंशज होकर भी 

करते क्यों लाचार सी बातें ? 

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

डिग्रियों की बैसाखी पर 

कब तक रोज़ी ढूंढ़ी जायेगी ? 

दिशाहीन श्रृंखला में कब तक 

कड़ियां जोड़ी जायेगी ? 

देखी नहीं नींव जब तुमने 

करते क्यों आधार की बातें ?

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

परिचय मिला नहीं जीवन में 

जिनको अभी किनारों का

हाल भला कैसे कहते वो 

बीच नदी की धारों का ? 

देखी नहीं नाव जब तुमने 

करते क्यों पतवार की बातें ? 

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

शकुनी के शतरंजी पाशों ने 

चली है जब भी टेढ़ी चालें

पाँच-पाँच पतियों की पत्नी 

फिर छठवें के हुयी हवाले

मर्यादा की चौपड़ है तो 

करते क्यों व्याभिचार की बातें ? 

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

इंद्र के मायावी रूपों से 

कब तक अहिल्या छली जायेगी ? 

धर्म रक्षकों की छाती पर 

कब तक यूँ ही मूंग दली जायेगी ? 

शील भंग जब कर्म तुम्हारा 

करते क्यों संस्कार की बातें ? 

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ? 

शर-शैय्या पर भीष्म पितामह की 

साँस कहाँ टूटने पायी ? 

शस्त्र और शास्त्र साथ मिले जब 

अधर्म ने है मुंह की खाई । 

करना है "अमरेश" तुम्हे कुछ 

करते क्यों न सुधार की बातें ? 

भूल गए हो कैसे तुम 

अपने अधिकार की बातें ?

अधिकार सुधार संस्कार

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