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एक रूठा दोस्त
एक रूठा दोस्त
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© Nikhil Sharma

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धागा जज़्बात का पकड़े खड़े थे हम दो किनारों पर। 
रिश्ता बनाया था जो हमने उम्मीदों के सहारों पर ॥ 
पर शर्त ऐसी थी कि न में उसे देख सकूँ, न वो मुझे । 
बस भरोसा था, इससे ज़्यादा किसी को कोई क्या सूझे ॥ 
बस एक दूजे की आवाज़ पर यक़ीन करते थे । 
और दोस्ती के धागे को मज़बूती से पकड़ते थे ॥ 
पर किसी को इस दोस्ती से जलन हो गई । 
इस धागे की ख़ूबसूरती से किसी को ख़लिश हो गई ॥ 
उसने उठाया फ़ायदा की हम एक दूजे को देख नहीं सकते थे । 
इस बात का कि हम एक दूसरे पे हद से ज़्यादा यक़ीन रखते थे ॥ 
आकर उसने चुपके से, वो धागा कपट छूरी से काट दिया । 
हमारे प्यारे दोस्ती के धागे को बाँट दिया ॥ 
हम एक दूजे को सुन न सकें इसलिऐ बीच में शोर भरा । 
नफ़रत का ज़हर उसने पुरज़ोर भरा ॥ 
मुझे लगा दोस्त चला गया मुझे छोड़ के । 
दोस्त को लगा मैं चला गया उससे मुँह मोड़ के ॥ 
हम आगे बढ़ते रहे ,अपने अपने हिस्से का धागा लिऐ हाथ में । 
हम रूठे थे पर फिर भी थे कुछ साथ में ॥ 
अभी भी इंतेज़ार है तो बीच के इस शोर को मिटाने का । 
जो गलतफहमियों का ज़हर आ गया है, उसको हटाने का ॥ 
है यक़ीन की रूठा दोस्त फिर मान जाऐगा । 
और बिना किसी गाँठ के ये दोस्ती का धागा फिर से जुड़ जाऐगा ॥

#धागा जज़्बात का पकडे खड़े थे हम दो किनारो पर। रिश्ता बनाया था जो हमने उम्मीदों के सहारों पर ॥

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