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विहंगवलोकन
विहंगवलोकन
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© Sarthak Shah

Inspirational

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दूर उस पर्वत की चोटी पे देखा एक इल्ली को,

जो फफूंद से निकलने की कोशिश कर रही है |

जैसे की,

उड़ने को बेताब पतंग एक,

पवन की उस एक लहर को ढूंढ रही है|

 

इस महानगरी के मायाजाल में फँसी है ज़िन्दगी,

दो पल सुकून की सांस लेने की कोशिश कर रही है|

जैसे की,

घने जंगल के डेरे में,

सुकून की वह सेहर ढूंढ रही है|

 

ढूंढते ढूंढते निकल गये कोसो दूर,

क्या ढूंढ रहे थे, यादें मेरी, वही ढूंढ रही है|

जैसे की,

अँधेरों की गहराइयों में फँसी ये जान,

सुबह की किरनों को ढूंढ रही है|

 

 

 

 

महानगरीय जीवन की त्रासदी

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