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Wohoo!,
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रखैल....
रखैल....
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© Sana K S

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बोलने में जिस शब्द को, मुझे कोई दिक्कत ना हुई,

फिर क्यों सुनते ही उसकी आँखें नम हुई...


ऐसा क्या था उस लफ़्ज में,मैं समझ ना पायी,

वो,पत्नी थी किसी की इतनी समझ थी मुझमें

तो क्यों था उसका रखैल नाम से नाता जुड़ा......

.

मुझसे उसकी ख़ामोशी कहाँ सही जा रही थी,

मैंने फिर से उसे बड़े ताव से पूछा...

.

वो...हल्के से मुस्कुराई, लेकर पास मुझे वो कुछ बुदबुदाई....

मंद लेकर उसने स्वर, भर लिऐ आँखों में नीर,

कहने लगी फिर कहते ना रूकी..........

सपने तो मेरे थे हजारों, साथ में किसी साथी के होने के,

माँग खाली थी मेरी, एहसास था सिंदूर सजाने का,

समझ पाती कि, सारे सपने वो चुरा ले गया तो,

मैं रखैल ना बनती कभी.......

.

मुझे पाने का था उसका स्वार्थ, कैसे पाता घर पर बीवी थी सोती,

बाज़ारों से वो था डरता, ख़रीद लाया मेरे लिऐ एक मकान,

पिंजरे को घर का नाम ना देती तो,

मैं रखैल ना बनती कभी.......

.

हर नीत त्यौहार उसकी सुहागन के,मैं सिर्फ़ अपनी कलाईयों को रँग जाती,

श्रृंगार देखने को मेरा कहाँ उसे फुरसत होती, याद करता रहकर बीवी भूखी इंतेज़ार थी करती,

परिवार का लालच ना करती तो,

मैं रखैल ना बनती कभी.......

.

डरता हैं कहीं कोई देख ना ले,बदनामी का दानव लड़वाता मुझसे,

चोरों सा मिलने मुझसे आता, घर पर राजा बनकर जाता,

इज्ज़त पाने का भ्रम ना करती तो,

मैं रखैल ना बनती कभी......

कहते कहते वो बहुत रोई....

.

"" मैं रखैल ना बनती कभी ""...............

 

हम्म्म...

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