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एक तमाशा उर्फ़ बाजीगर का गीत
एक तमाशा उर्फ़ बाजीगर का गीत
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© Udbhrant Sharma

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एक तमाशा उर्फ़ बाजीगर का गीत

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

आग कि जो इस हवन-कुंड में दहक रही है

मेरे भीतर फूल-सरीखी महक रही है,

बोल रही है जल की भाषा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

ये पहाड़ जो, गर्वोन्नत, सिर तान खड़ा है

मेरी छाती पर कैसा चुपचाप पड़ा है,

बना हुआ है तोला-माशा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

मीठा झरना घाटी के भीतर बहता था,

अपनी प्यास बुझाओ-यह सबसे कहता था,

मैं जब लौटा, प्यासा-प्यासा

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

जिसकी माँग बीच मैंने तारे बिखराये,

और पाँव में मोती के बिछुए पहनाये

निकली वही तवायफ़ आशा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

पत्थर है लेकिन पल-पल में पिघल रही है,

मेरे मन में दुष्ट निराशा मचल रही है,

बाँट रही है दूध-बताशा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

जीवन की चैपड़ खेलते बहुत दिन बीते

रहा मुक़द्दर ऐसा, हर बाज़ी हम जीते,

अबकी पलट गया हर पाँसा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

जीवित रहने, इंच-इंच जो खिसक रही थी,

मरुथल के बीच में पड़ी जो सिसक रही थी,

अमृत पीती वही पिपासा,

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

जल की तलाश करते-करते आग हुई जो

जलते अनंत मरु में हिरना राग हुई जो

अमृत पीती वही पिपासा

आ बंजारे!

तुझे दिखाऊँ एक तमाशा

एक तमाशा उर्फ़ बाजीगर का गीत

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