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नायाब
नायाब
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© Ashish Aggarwal

Romance

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मेरा अज़ीज़[1] घर से होकर इतना नायाब[2] निकलता है,
जिस तरह सुबह-सुबह फ़लक से आफ़ताब[3] निकलता है।

मंज़र ना पूछिए वो चेहरे से घनी ज़ुल्फ़ों को हटाने का,
जैसे अन्धेरी रात में आहिस्ता-आहिस्ता माहताब[4] निकलता है।

हल्का सा मुस्कुराने पर भी गालों का सुरख हो जाना,
मानो ओस की शबनम से खिला कोई गुलाब निकलता है।

माशा-अल्लाह[5], उनकी बातों की मिठास का ज़ाइका,
यूं लगता कि आबशार[6] से मिट्ठा-मिट्ठा आब निकलता है।

सुभान-अल्लाह[7], इक जादू सा है उनकी कोशिशों में भी,
उनका किया हर जत्न[8] अक्सर जो कामयाब निकलता है|

उनके लिबाज़ों की सादगी, वो ताज़गी, वो नाराज़गी,
उनकी हर अदा पर अशीश दिल से आदाब निकलता है।



[1] प्रेयसी

[2] दुर्लभ

[3] सूर्य

[4] चंद्रमा

[5] प्रशंसा

[6] झरना

[7] ईश्वर की प्रार्थना

[8] प्रयास

नायाब

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