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पृथ्वी
पृथ्वी
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© नवल पाल प्रभाकर दिनकर

Drama

1 Minutes   13.9K    7


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सूरज की आहत किरणों से

दी है तुमने राहत मुझे

छम-छम गिराकर मधु धार से

तृप्त तुमने किया है मुझे ।

आँखें मुंदे पागल होकर

करने लगी मैं तांडव नृत्य

बयार चले सुवाषित होकर

पंछी गुंजन लगे हैं करने

फि र भला कैसे रह पाती

सखियां सजाने लगी हैं मुझे।

छम-छम गिराकर मधु धार से

तृप्त तुमने किया है मुझे ।

हर समय तपती किरणों से

आँचल बन बचाया मुझे

खुद पर झेली आग ये सारी

शीतलता दी तुमने मुझे

ओ प्यारो ओ सुन्दर मुघों

हर सुख तुमने दिया है मुझे।

छम-छम गिराकर मधु धार से

तृप्त तुमने किया है मुझे ।

अनायास मेरे मुख से

फु ट पड़ी ठंडी सिसकारी

हाथ उठे ऊपर मेरे

खिलने लगी है फु लवारी ,

छुकर अपने तन से जैसे

दिया है एक नया रूप मुझे

छम-छम गिराकर मधु धार से

तृप्त तुमने किया है मुझे ।

Nature Earth Life

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